विधि विज्ञान (Forensic Science)

विधि विज्ञान की परिभाषा 

फारेसिंक साइंस (Forensic Science) एक लैटिन शब्द है, जो फारेसिक और साइंस को मिलाकर बनता है।

फारेसिंस का मतलब होता है, “जहां लोग एक ही जगह बैठकर अपने-अपने विचारों को रखते है तथा उन पर चर्चा करते हैं।

“ विधि विज्ञान, समस्त विज्ञान का एक समूह है जिसका प्रयोग अपराधिक मामलों एवं सिविल मामलों को वैज्ञानिक तरीके और तकनीकें अपनाकर हल करने के लिये किया जाता है।

क्या अपराध विज्ञान एवं विधि विज्ञान एक समान है? (Criminology and Forensic Science)

 अपराध विज्ञान एंव विधि विज्ञान अलग-अलग नाम है परन्तु दोनों के कार्य एक ही है।

दोनों का कार्य एक-दूसरे की तकनीकों एवं विधियों का प्रयोग कर अपराध-स्थलों की जाँच, साक्ष्योे की जाँच एवं विश्लेषण तथा परीक्षण करना है। 

अपराधिक विज्ञान को विधि विज्ञान के रूप में भी जाना जाता है।

विधि विज्ञान का विश्व इतिहास (World History of Forensic Science)

  • सर आर्थर कॉनन डॉयल ने अपने काल्पनिक चरित्र शरलॉक होम्स से विधि विज्ञान को बहुत प्रसिद्ध बनाया है। उन्हें विधि विज्ञान के जनक के रूप में भी जाना जाता है।
  • मिंग यूएन शिह लू (Ming Yuen Shih Lu)” नामक एक पुस्तक में चीन में 6 वीं शताब्दी के आसपास की अवधि में अँगुली चिन्ह के उपयोग का भी उल्लेख किया गया है।
  • कौटिल्य ने हज़ारों साल पहले अपनी पुस्तक अर्थशास्त्र में पैपिलरी लाइनों के स्वरुप के अध्ययन का उल्लेख किया था। उंगलियों के निशान की विशिष्टता के कारण, पहचान के रूप में इसका उपयोग करना आम था।
  • 1775 में, एक स्वीडिश केमिस्ट कार्ल विल्हेम शेहेल ने शव में आर्सेनिक का पता लगाने के लिए पहला सफल परीक्षण तैयार किया और बाद में जर्मन केमिस्ट वैलेन्टिन रोज द्वारा कार्य का विस्तार किया गया। उन्होंने पेट की दीवारों (stomach wall) में आर्सेनिक जहर की अल्प मात्रा का पता लगाने के लिए विधि की खोज की।
  • 1814 में, मैथ्यू जोसेफ बोनावेंट ऑरफेला ने जहर का पता लगाने और जानवरों पर उनके प्रभावों पर पहला वैज्ञानिक ग्रंथ प्रकाशित किया। वह एक स्पेनिश विष वैज्ञानिक और केमिस्ट थे, जिन्हें विष विज्ञान का पिता भी कहा जाता है। उन्होंने रासायनिक विश्लेषण को विधि चिकित्सा का एक हिस्सा बनाने के लिए कार्य किया।
  • 1835 में, कैल्विन हूकर गोडार्ड ने बुलेट तुलना के उपयोग के बारे में बताया। केल्विन गोडार्ड को विधि आग्नेयशास्त्र (फारेसिंक बैलिस्टिक) के पिता के रूप में भी जाना जाता है।
  • अल्फोंजो बर्टिलान ने अपराध को सुलझाने के लिए उंगलियों के निशान का इस्तेमाल किया था। वह प्रथम विधि फ़ोटोग्राफ़र भी थे।
  • लगभग 1850 और 1860 के दशक में, भारत में कार्य करने के समय विलियम जे हर्शल ने हस्ताक्षर के रूप में उंगलियों के निशान और हाथों के निशान का उपयोग करना शुरू किया।
  • 1880 में, हेनरी फॉल्ड्स ने नेचर पत्रिका में उंगलियों के निशान से अपराधियों को पकड़ने के बारे में एक पेपर प्रकाशित किया। हेनरी फॉल्डस पहले व्यक्ति थे जिन्होंने विधि उपयोग के लिए उंगलियों के निशान का सुझाव दिया था।
  • फ्रांसिस गाल्टन पहले थे जिन्होंने वैज्ञानिक आधार पर उंगलियों के निशान और इसके उपयोग के बारे में अध्ययन किया। उन्होंने इस पर 3 पुस्तिकाएँ प्रकाशित कीं.
  • 1893 में, जुआन वूसेटिच ने एंथ्रोपोमेट्रिक सिस्टम एंड फ़िंगरप्रिंट्स के लिए सामान्य निर्देश पर अपना पहला प्रकाशन किया।
  • 1893 में, हंस ग्रॉस ने अपनी पुस्तक मैनुअल फॉर इन्वेस्टिगेटर्स, पुलिस ऑफिशियल्स एंड जेंडरर्मेस शीर्षक से प्रकाशित की।
  • डॉ एडमंड लोकार्ड ने विधि विज्ञान का मूल सिद्धांत तैयार किया, जो कि हर संपर्क एक निशान छोड़ता है है। उन्हें फ्रांस के शर्लाक होम्स के रूप में भी जाना जाता है।
  • अल्बर्ट शर्मन ओस्बोर्न पहले व्यक्ति थे जिन्होंने प्रश्नांकित दस्तावेज़ परीक्षण और जाली दस्तावेज़ विश्लेषण की शुरुआत की।
  • वाल्टर सी मैकक्रोन (1916-2002) ने अपराधों को सुलझाने और साक्ष्यों के विश्लेषण के लिए सूक्ष्मदर्शी तकनीकों का विकास किया।
  • 1916 में, डॉ लियोन लेट्स ने सूखे रक्त से रक्त समूह को निर्धारित करने के लिए एक प्रक्रिया विकसित की।
  • मार्क ट्वेन ने अँगुली चिन्ह पहचान द्वारा हत्यारोपी की पहचान का उल्लेख किया।
  • ल्यूक मे ने टूल मार्क स्ट्राइक एनालिसिस और ऑब्जर्वेशन विकसित किया और 1930 में अमेरिकन जर्नल ऑफ पुलिस साइंस में अपना कार्य प्रकाशित किया।
  • 1863 में, क्रिश्चियन शोनबेइन नामक एक जर्मन वैज्ञानिक ने रक्त के लिए पहला प्रारंभिक परीक्षण खोजा।
  • 1879 में, एक जर्मन वैज्ञानिक रूडोल्फ विरचो ने पहली बार बाल की विभिन्न विशिष्टताओं का वर्णन किया।
  • एफबीआई द्वारा 1998 में बनाए गए राष्ट्रीय डीएनए सूचकांक प्रणाली का विकास।

विधि विज्ञान का भारतीय इतिहास (Indian History of Forensic Science)

  • 1849 में चेन्नईमें पहली रासायनिक परीक्षण प्रयोगशाला स्थापित की गई।
  • 1853 में, कोलकाता में दूसरी रासायनिक परीक्षण प्रयोगशाला स्थापित की गई।
  • मुंबई में 1870 में चौथी रासायनिक परीक्षण प्रयोगशाला की स्थापना की गयी।
  • आगरा में 1864 में तीसरी रासायनिक परीक्षण प्रयोगशाला स्थापित की गयी।
  • एंथ्रोपोमेट्री ब्यूरो पहली बार 1892 में कोलकातामें स्थापित किया गया। यह बर्टिलॉन प्रणाली पर आधारित था।
  • 1898 में नागपुरमें पहली विस्फोटक परीक्षण प्रयोगशाला विकसित की गई।
  • 1904 में बंगालमें पहली बार “गर्वनमेंट इक्जामिनर ऑफ क्वेशचंड डाक्यूमेंट”  की स्थापना हुई और 1906 में इसे शिमलामें स्थानांतरित कर दिया गया।
  • 1902­-03 को रॉयल पुलिस आयोग की सिफारिशों के बाद, भारत में पहला केंद्रीय फिंगर प्रिंट ब्यूरो (सीएफपीबी) 1905 में शिमला में स्थापित किया गया।
  • 1910 में कोलकातामें डॉ हैंकिन द्वारा सीरोलॉजी विभाग की स्थापना की गई।
  • वर्ष 1915 के दौरान, सीआईडी, बंगाल सरकार के द्वारा एक पदचिह्न अनुभाग स्थापित किया गया।
  • बंगाल सरकार द्वारा 1917 में, जाली नोटों की जाँच करने के लिए CID, बंगाल सरकार के तहत जाली नोट अनुभागबनाया गया।
  • 1930 में, आग्नेयास्त्रों की परीक्षण से निपटने के लिए कलकत्ता पुलिस के अधीन एक शस्त्र विशेषज्ञ नियुक्त किया गया और एक छोटी बैलिस्टिक प्रयोगशाला स्थापित की गई।
  • 1936 के दौरान, बंगाल में सीआईडी ​​के द्वारा एक वैज्ञानिक अनुभाग स्थापित किया गया था और अपराध करने के लिए उपयोग किए जाने वाले गोलियों, कारतूस मामलों, आग्नेयास्त्रों आदि की जांच के लिए प्रयोगशालाएँ बनाई गई।
  • भारत में पहली राज्य विधि विज्ञान प्रयोगशाला की स्थापना वर्ष 1952 में कलकत्ता में हुई थी।
  • भारत में कलकत्ता में केंद्रीय जासूसी प्रशिक्षण स्कूल, 1956 के दौरान स्थापित किया गया था और सीएफपीबी, कलकत्ता के साथ (उसी परिसर में) स्थित था।
  • फ़िंगरप्रिंट ब्यूरो की स्थापना भी कोलकाता में 1957 में खान बहादुर अज़ीज़ उला हक और रे बहादुर खेम ​​चंद्र बोस द्वारा की गई थी। इस ब्यूरो के लिए इन दोनों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया।
  • 1957 के दौरान कलकत्तामें पहली केंद्रीय विधि विज्ञान प्रयोगशाला स्थापित की गई।
  • द इंडियन एकेडमी ऑफ फारेंसिक सांइसेज (IAFS) की स्थापना वर्ष 1960 में हुई थी।
  • इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिमिनोलॉजी एंड फारेंसिक साइंस (ICFS) की स्थापना 1971 में दिल्ली में कार्यरत कर्मियों को प्रशिक्षण देने और क्रिमिनोलॉजी और विधि विज्ञान में अनुसंधान करने के सीमित उद्देश्यों के साथ की गई।
  • सेंट्रल डिटेक्टिव ट्रेनिंग स्कूल, हैदराबाद को 1964 में स्थापित किया गया था, सीडीटीएस, कलकत्ता की तर्ज पर 1973 के दौरान चंडीगढ़में भी स्थापित किया गया।

विधि विज्ञान की आवश्यकता (Importance of Forensic Science)

 I. समाज में हो रहे लगातार परिवर्तन के कारण – समाज में हो रहे तेजी से बदलाव के कारण अपराध भी उतनी ही तेजी से हो रहे है और अपराध करने के लिए अपराधी नए तरीके खोजते हैं। अपराधियों को पकड़ने के लिए विधि विशेषज्ञों को भी अपने नए प्रयोगों एवं तरीकों को लगातार आधुनिकता के साथ निर्मित करने की जरूरत है।

II. प्रौद्योगिकी और तकनीक का निरन्तर विकास एंव खोज अपराधी गलत कार्यों के लिए नई-नई तकनीकों का प्रयोग कर रहे हैं। विधि विशेषज्ञों को इस समस्या को सुलझाने तथा अपराधियों को पकड़ने के लिए हमेशा नए उपकरणों और तकनीकों की खोज करने की आवश्यकता होती है।

III. अधिक अपराध के साथ अधिक साक्ष्यों को समझने की आवश्यकता – जिस प्रकार अपराध दर में तेजी से वृद्धि हो रही है, उसी प्रकार नए-नए साक्ष्यों से भी परिचय हो रहा हैं।

IV. बढ़ता अपराध दर  समय और जनसंख्या के साथ अपराध दर बढ़ रहा है इसलिए उन्हें हल करने के लिए कम समय में अधिक प्रमाणिकता के साथ अपराधियों को पकड़ने के लिए विधि विज्ञान की आवश्यकता है।

V. जनसंख्या में लगातार हो रही वृद्धि जिस प्रकार से जनसंख्या में वृद्धि हो रही है, उसी प्रकार अपराध दर भी तेजी से वृद्धि हो रही है। बढ़ते अपराध को नियंत्रित करने के लिए विधि विज्ञान की आवश्यकता है।

VI. अन्यज्यादातर अपराध होने के विभिन्न कारण निम्नलिखित हैं;

  •   बेरोजगारी,
  •   पितृत्व विवाद,
  •   रिश्वत,
  •   भूमि विवाद,
  •   फिरौती,
  •   धन सम्बन्धी विवाद,
  •   अनुचित लाभ,
  •   धार्मिक विवाद, आदि।

उपरोक्त कारणों से विधि विज्ञान प्रयोगशालाओं और विधि विशेषज्ञों की संख्या में अधिक विस्तार करने की आवश्यकता है जिसके परिणामस्वरुप न्याय में अधिक विलम्ब नहीं होगा तथा न्यायलयों में लंबित मामलों की संख्या कम होगी।

विधि विज्ञान का जितना अधिक और तीव्र विकास होगा, अपराधिक मामले उतने ही तीव्र गति से निस्तारित होगें।

जिम्मेदारियाँ (Responsibilites of Forensic scientists)

  • विधि वैज्ञानिक निष्कर्ष अभिलिखित करते हैं और अपराध-स्थल से चिन्ह-साक्ष्य एकत्र करते हैं। 
  • विधि वैज्ञानिक को नमूनों का विश्लेषण करने की आवश्यकता होती हैं, जैसे कि; बाल, शरीर के तरल पदार्थ, कांच, पेंट और ड्रग्स, इत्यादि।
  • प्रयोगशाला में, वैज्ञानिकों को साक्ष्यो के विश्लेषण के लिए विभिन्न तकनीकों का उपयोग करना होता है, जैसे कि; गैस और उच्च-प्रदर्शन तरल क्रोमैटोग्राफी, स्कैनिंग इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी, मास स्पेक्ट्रोमेट्री, इन्फ्रारेड स्पेक्ट्रोस्कोपी और जेनेटिक फिंगरप्रिंटिंग।
  • वे अपराध-स्थल की जांच करते हैं और अन्य एजेंसियों के साथ समन्वय करते हैं, जैसे कि; पुलिस।
  • वे अपराध स्थल पर मौजूद सहायकों के कार्य की निगरानी करते हैं।
  • वे भविष्य में विधिक कार्यवाहियों के उपयोग के लिए अपने कार्य के परिणामों को लिखित रूप में दर्ज रखते हैं।
  • वे न्यायिक प्राधिकरण की मांग के अनुसार न्यायालय में मौखिक-साक्ष्य भी देते हैं।
  • वे न्यायालयों में जिरह के तहत निष्कर्षों को सिद्ध करते हैं, अनुसंधान करते हैं और नई तकनीकें विकसित करते हैं।

विधि विज्ञान कितना विश्वसनीय है? (How Reliable Forensic Science Is?)

किसी भी स्थिति में, प्रायः अधिकांश आपराधिक साक्ष्यों को तीव्र तार्किक विश्लेषण द्वारा साक्ष्यों को देने में मदद की जाती है एवं यह किसी व्यक्ति विशेष (जो कि दोषपूर्ण है) के लिये नहीं होता है।

हालाँकि विधि विज्ञान की कुछ सीमाएँ हैं, इस क्षेत्र में उपयोग की जाने वाली कुछ तकनीकों में कई प्रतिबंध हैं जो परिणामों की व्यावहारिकता पर सवाल उठाते हैं। विश्वसनीयता की कमी के लिए विधि विज्ञान सवालों के घेरे में है।

विधि विज्ञान प्रयोगशालाओं द्वारा परिणाम के 100 प्रतिशत सही होने का आश्वासन नहीं दिया जाता है और इसलिए प्रयोगशालाओं द्वारा उस निष्कर्ष को “सम्भव”, “हो सकता है” आदि के साथ दिया जाता है। 

नई तकनीकों और तरीकों के साथ विधि विज्ञान दिन प्रतिदिन तेजी से बढ़ रहा है। परन्तु अपराध-स्थल, साक्ष्य, विशेषज्ञों की कमी और सही प्रशिक्षण की कमी के कारण, यह अभी भी कम विश्वसनीय है। न्यायालय अपराध की सजा के लिए पूरी तरह से विधि विज्ञान प्रयोगशाला की रिपोर्ट पर भरोसा नहीं करती हैं।

अधिवक्ताओं द्वारा साक्ष्यों का उपयोग तर्क अथवा बहस के किसी भाग के रूप में किया जाता है ताकि किसी को दोषी या निर्दोष साबित किया जा सके।

वर्तमान समय में भी न्यायालय केवल विधि साक्ष्य के आधार पर अभियुक्तों को दोषी या दोषमुक्त साबित नहीं करती है।

विधि विज्ञान के नियम और सिद्धांत ( Law and Principles of Forensic Science)

 विधि विज्ञान वह विज्ञान है जिसने अपने नियम और सिद्धांत विकसित किए हैं। सभी बुनियादी विज्ञानों के नियम और सिद्धांत विधि विज्ञान का आधार हैं। प्रत्येक वस्तु चाहे वह प्राकृतिक हो या मानव निर्मित, उसकी एक विशिष्टता होती है जिसे किसी अन्य वस्तु में दोहराया नहीं जा सकता है।

विधि विज्ञान के नियम और सिद्धांत नीचे दिए गए हैं:

1. वैयक्तिकता का नियम

एक अपराध में शामिल हर चीज में विभिन्नता होती है। यदि वही प्रमाणित है, तो यह अपराध और अपराधी को जोड़ता है।

यह सिद्धांत शुरू में आम मान्यताओं और टिप्पणियों के विपरीत लगता है। रेत या आम नमक के दाने, पौधों के बीज या जुड़वां एक जैसे ही दिखते हैं परन्तु उनका सूक्ष्मता से अध्ययन करने के बाद उनमें अंतर पता चलता है।

2. विनिमय का सिद्धांत

“संपर्क निशान छोड़ता है” विनिमय का सिद्धांत हैं। इसे सबसे पहले फ्रांसीसी वैज्ञानिक, एडमंड लोकार्ड ने प्रस्तुत किया था। आमतौर पर इसे एडमंड लोकर्ड के विनिमय का सिद्धांत कहा जाता है।

इस सिद्धांत के अनुसार जब भी अपराधी या उसके अपराध के साधन पीड़ित या आस-पास की वस्तुओं के संपर्क में होते हैं, तो वे कोई ना कोई निशान छोड़ देते हैं। इसी तरह अपराधी या उसके उपकरण भी एक ही संपर्क से निशान प्राप्त करते हैं।

3. प्रगतिशील परिवर्तन का कानून

“परिवर्तन अपरिहार्य है”, यह कथन आपराधियों, चीजों या वस्तुओं पर भी लागू होता है। विभिन्न प्रकार की वस्तुओं के परिवर्तन में अलग-अलग समय लग सकता है। अपराधी प्रगतिशील परिवर्तन से गुजरता है। यदि वह समय पर नहीं पकड़ा जाता है, तो उसे पहचानना मुश्किल हो जाता है। अपराध-स्थल में भी तेजी से बदलाव आता है।

मौसम का परिवर्तन, विभिन्न वनस्पतियों का विकास, और जीवित जीव बहुत कम समय में व्यापक परिवर्तन करते हैं।

समय के साथ नमूने भी ख़राब हो जाते हैं, निकाय विघटित हो जाते हैं, टायर ट्रैक और काटने के निशान धूमिल या हल्के हो जाते हैं, धातु की वस्तुओं में जंग लग सकती है, इत्यादि।

4. तुलना का सिद्धांत

तुलना का सिद्धांत है:

“केवल सदृश की तुलना की जा सकती है”

यह संदेहास्पद नमूनों से तुलना के लिये सद्श नमूनों को प्रदान करने की आवश्यकता पर जोर देता है। एक प्रश्नाकिंत बाल की तुलना केवल ज्ञात बालों के नमूने के साथ की जा सकती है, अन्य निशान जैसे कि; उपकरण के निशान, काटने के निशान, टायर के निशान आदि के साथ भी यही प्रक्रिया अपनाई जाती है।

उदाहरण के लिए –

  • ऐसा नमूना जो कि उसी दीवार पर, उसी ऊंचाई पर तथा उसी साधन से लिखा गया हो और उसका फोटोग्राफ लिया गया हो तो ही वह प्रश्नांकित नमूने के साथ मिलाया जा सकता है।
  • एक शोध में दीवार पर लिखी गयी लिखावट की तुलना कागज पर लिखे गये लिखावट के नमूने से की गई जिसका कोई सार्थक परिणाम नहीं निकला।

5. विश्लेषण का सिद्धांत

विश्लेषण का सिद्धांत नमूने के विश्लेषण के लिए सबसे अच्छा कार्य करता है। यदि साक्ष्य या नमूनों को सही ढंग से नहीं रखा गया है या खराब हो गया है तो विश्लेषण नहीं किया जा सकता है। नमूनों के सर्वोत्तम विश्लेषण के लिए, नमूनों को अच्छी स्थिति में रखा जाना चाहिए और एक दूसरे से अलग रखा जाना चाहिए।

6. संभाव्यता का नियम

सभी पहचानने योग्य प्रमाण, निश्चित या अनिश्चित,  सचेत रूप से या अनजाने में संभावना के आधार पर बनाया गया है। संभावना को ज्यादातर गलत समझा जाता है। यदि हम कहते हैं कि संभाव्यता के अनुसार एक विशेष अँगुली चिन्ह दिए गए स्रोत से आया है, परन्तु यह एक निश्चित राय नहीं है।

संभाव्यता एक वैज्ञानिक विचार है। यह किसी विशेष घटना के होने की संभावना को एक विशेष तरीके से निर्धारित करता है।

यदि “P” = प्रायिकता, “एनएस” = उन तरीकों की संख्या जिसमें घटना सफलतापूर्वक हो सकती है और “Nf” = उन तरीकों की संख्या जिनमें यह विफल हो सकता है, सफलता की संभावना सूत्र द्वारा दी गई है:

7. पारिस्थितिजन्य तथ्यों का नियम

“Facts Do Not Lie, Men Can And Do”

एक प्रत्यक्षदर्शी या पीड़ितों द्वारा दिया गया साक्ष्य हमेशा सत्य नहीं हो सकता है। कभी-कभी पीड़ित जानबूझकर या कभी-कभी खराब याद्दाश्त, गलत बयानी और संदेह के कारण झूठ या गलत बोल सकते हैं (जैसे कि; कम दृष्टि, अस्पष्ट सुनवाई) ।

कार्ल मार्क्स के अनुसार “सच्चा विश्वास केवल तब ज्ञान बन जाता है जब किसी प्रकार की जाँच और साक्ष्य द्वारा साबित किया गया हो”।

अपराध-स्थल (Crime Scene)

अपराध-स्थल क्या है?

अपराध स्थल एक ऐसा स्थान है जहाँ अपराध किया गया है।

अपराधस्थल कीविवेचना

घटित अपराध की जगह की जांच को अपराध स्थल की जांच कहा जाता है। अपराध-स्थल की जांच बहु-विषयक और बहुकार्यण है जिसमें अपराध-स्थल का एक व्यवस्थित और योजनाबद्ध अन्वेषण शामिल है।

अपराधस्थल की विवेचना टीम

अपराध-स्थल की जांच टीम में विविध प्रकार के विशेष विषयों में प्रशिक्षित पेशेवर जांचकर्ताओं का एक समूह शामिल होता है।

टीम के सदस्य

  • घटनास्थल पर प्रथम पुलिस अधिकारी
  •  चिकित्सक (यदि आवश्यक हो)
  • जांचकर्ता
  • चिकित्सा परीक्षक (यदि आवश्यक हो)
  • फोटोग्राफर और / या फील्ड साक्ष्य तकनीशियन
  • प्रयोगशाला विशेषज्ञ। जैसे कि; पैथोलॉजिस्ट, दस्तावेज एवं हस्तलेखन विशेषज्ञ, अँगुली चिन्ह विशेषज्ञ, सीरमवैज्ञानिक, आग्नेयशास्त्र विशेषज्ञ, डीएनए विशेषज्ञ, विषविज्ञान विशेषज्ञ।

वह व्यक्ति जिसने अपराध किया हो, उसकी पहचान कैसे संभव है

  • अल्प मात्रा में रक्त या एक बाल या एक रेशा या त्वचा का एक हिस्सा या किसी भी मात्रा में विभिन्न प्रकार की सामग्रियाँ अन्वेषणकर्ता को अपराधी तक पहुँचने एवं अपराध को पुनः संगठित करने में सहायता कर सकती है।
  • अपराध-घटना की जांच का लक्ष्य किसी अपराध के स्थान पर साक्ष्यों को पहचानना, दस्तावेज बनाना और एकत्र करना है।
  • अपराध को सुलझाना, साक्ष्यों को एक साथ इस तरह से इकट्ठा करने पर निर्भर करता है जिससे कि यह पता लग सके कि अपराध-स्थल पर क्या हुआ है।

जांच प्रक्रिया निम्नलिखित है:

  • साबित करें कि वास्तव में एक अपराध हुआ है,
  • संदिग्ध को पहचानना और उसे गिरफ्तार करना,
  • साक्ष्यों की पहचान और उनका विश्लेषण।
  • चोरी की गई संपत्ति की बरामदगी,
  • व्यक्ति के अभियोजन में सहायता, अपराध के साथ आरोपित।

अपराधस्थल के विवेचनकर्ता कौन है?

एक अपराध-स्थल अन्वेषक सामान्यत: कानून प्रवर्तन एजेंसी का सदस्य होता है, जो कानून व्यवस्था बनाए रखने और अपराधियों को पकड़ने के लिए जिम्मेदार होता है। वे अपराध की जाँच, साक्ष्यों का संग्रह, संरक्षण और पैकेजिंग करते हैं।

विवेचना का उद्देश्य

आपराधिक जांच और विधि विज्ञान का उद्देश्य मामले के पीछे की सच्चाई की खोज करना है।

अपराध स्थल की जाँच का उद्देश्य, अन्वेषण करना और साबित करना है:

  •  क्या हुआ?
  • क्या कारण था?
  • यह किसने किया?
  • ये कैसे हुआ?
  • कौन प्रभावित है?
  • अपराध का आधार कहां है? आदि।

उपरोक्त कुछ प्रश्न अपराध-स्थल की जांच के उद्देश्य के उदाहरण हैं।

अपराध-स्थल के प्रकार (Types of Crime Scene)

  1.  बाह्य अपराध-स्थल
  2. आंतरिक अपराध-स्थल
  3. बाह्य-आंतरिक अपराध-स्थल
  4. वाहन

1. बाह्य अपराधस्थल

जब अपराध खुले स्थान पर होता है तो उस जगह को बाह्य अपराध-स्थल कहा जाता है। बाहरी अपराध स्थल पर साक्ष्य ढूंढना बहुत मुश्किल है क्योंकि बाहरी हस्तक्षेप के कारण ये बहुत आसानी से नष्ट हो जाते हैं, इसलिए इन स्थानों को सुरक्षित करने के लिए तत्काल ध्यान और कार्यवाही की आवश्यकता होती है।

उदाहरण के लिए- समुदायों के बीच दंगा, खुली जगह पर हत्या, हिट एंड रन, विस्फोट आदि।

2. आंतरिक अपराधस्थल

जब अपराध बंद स्थान पर होता है तो उस स्थान को आंतरिक अपराध-स्थल कहा जाता है। बाह्य अपराध-स्थल की तुलना में आंतरिक अपराध-स्थल के साक्ष्य अधिक उपलब्ध हो सकते हैं।

उदाहरण के लिए- दहेज मृत्यु, चोरी, मानवहत्या।

जब अपराध आंशिक रूप से बंद स्थान पर और आंशिक रूप से खुले स्थान पर होता है तो इसे बाह्य-आंतरिक अपराध-स्थल कहा जाता है। इस तरह के अपराध-स्थल को भी साक्ष्यों के नष्ट हो जाने की संभावना के कारण तुरंत सुरक्षित करने की आवश्यकता होती है।

उदाहरण के लिए- घर में हत्या और नदी में शव का निस्तारण, आदि।

वाहन परिवहन का एक साधन है।

परिवहन में या परिवहन द्वारा किया गया कोई भी अपराध इस श्रेणी में आता है। जैसे कि;

  • वाहन चोरी।
  • अपराध में शामिल वाहन ।
  • कार की चोरी।

इस प्रकार के अपराध-स्थल में साक्ष्य मिलने की संभावना अधिक सकारात्मक है क्योंकि अपराधी जल्दी-जल्दी में साक्ष्य छोड़ सकते हैं। एक वाहन, जैसे कि; चारपहिया, उचित प्रलेखन के पूरा होने के बाद प्रयोगशाला में ले जाया जा सकता है।

अपराध-स्थल को सुरक्षित कैसे करें? (How to secure a Crime Scene)

 सीमाओं की पहचान, चिन्हित एवं सुरक्षाकरन

–अपराध स्थल के आसपास स्थापित प्रारंभिक सीमा स्थल से बड़ी होनी चाहिए।

इस सीमा को बाद में आसानी से अंदर की ओर स्थानान्तरित किया जा सकता है, परन्तु इसे आसानी से नहीं बढ़ाया जा सकता क्योंकि आस-पास के क्षेत्र अंतराल सुनिश्चित करने के दौरान खराब हो सकता है।

–उत्तरदाता अधिकारी को जल्द से जल्द घटनास्थल पर सभी कार्यों और पर्यवेक्षण का दस्तावेज बनाना चाहिए। 

अपराधस्थल को सुरक्षित कैसे करें?

  • स्वाभाविकतः अपराध-स्थल की सुरक्षा का एक सामान्य नियम प्रत्येक मामले में लागू नहीं किया जा सकता है।
  • जो पहले अपराध-स्थल पर पहुंचते हैं उन्हें प्रथम अधिकारी या प्रथम उत्तरदाता कहा जाता है। प्रथम अधिकारी की सर्वोच्च प्राथमिकता अपराध-स्थल पर मौजूद घायल व्यक्ति को चिकित्सा उपलब्ध कराना होता है।
  • साक्ष्यों को सुरक्षित रखने और संदूषण को कम करने के लिए, अपराध-स्थल तक पहुंच सीमित होनी चाहिए और घटनास्थल पर मौजूद किसी भी व्यक्ति को पहचानना, दस्तावेजित करना और फिर अपराध-स्थल से हटा दिया जाना चाहिए।
  • अतिरिक्त अधिकारियों के आने के बाद, वे अनधिकृत व्यक्तियों को घटनास्थल से दूर रखने के लिए बैरिकेड्स और पुलिस टेप का उपयोग करके क्षेत्र को पृथक करने की प्रक्रिया शुरू करेंगे।

पहले अधिकारी को निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना चाहिए:

–  दरवाजे – खुले, बंद या तालाबंद? किस तरफ चाबी थी?

–  खिड़कियां – खुला या बंद? क्या वे बंद थे?

–  रोशनी – खुली या बंद? कौन सी लाइट चालू थी?

–  शेड्स, या शटर – खुला या बंद?

–  गंध – सिगरेट, धुआँ, गैस, गन पाउडर, इत्र, इत्यादि?

–  गतिविधि के संकेत – भोजन की तैयारी, सिंक में बर्तन, घर साफ या गंदा, आदि?

–  तारीख और समय संकेतक – पत्र, समाचार पत्र, दूध के डिब्बों पर तारीखें, बंद घड़ियां, खराब खाद्य पदार्थ, ऐसी वस्तुएं जो गर्म या ठंडी होनी चाहिए थीं, परन्तु कमरे के तापमान पर थीं।

अपराध-स्थल एवं साक्ष्य का दस्तावेजीकरण (Documentation of Crime Scene and Evidence)

अपराध स्थल के दस्तावेजीकरण और साक्ष्य में पांच प्रमुख कार्य शामिल हैं:

एक पुलिस नोट और नोटबुक्स के स्वीकृत पैरामीटर हैं:

• कवर पेज वाली एक पुस्तक जिसमें जांचकर्ताओं का नाम दिखाया गया है, वो तारीखें भी लिखी गई है जिस तारीख को नोटबुक शुरू की गई थी और जिस तारीख को नोटबुक संपन्न हुई थी।

• अनुक्रमिक पेज नंबर।

• एक बाउंड नोटबुक जिसमें से पृष्ठों को फाड़े जाने पर उनके क्रमों की वजह से पता लग सकता है।

• पंक्तिबद्ध पृष्ठ जो साफ-सुथरी पटकथा लिखने की अनुमति देते हैं।

• नोटबुक की प्रत्येक प्रविष्टि को शुरू करने में समय, दिनांक और मामले के संदर्भ का उल्लेख होना चाहिए।

• पृष्ठों पर रिक्त स्थान को प्रविष्टियों के बीच नहीं छोड़ा जाना चाहिए और, यदि कोई रिक्त स्थान छोड़ा जाता है, तो खाली जगह से सीधी या तिरछी रेखा द्वारा पूर्ण या आशिंक पृष्ठ काटा जाना चाहिए।

• नोटबुक में किए गए किसी भी त्रुटि को केवल त्रुटि पर से एक रेखा खींच कर काट देना चाहिये, और यह उस तरीके से नहीं किया जाना चाहिए जो त्रुटि को अस्पष्ट बनाता है।

मानचित्रण के कुछ बुनियादी प्रकार हैं जो अपराध स्थल रेखाचित्रण और मानचित्रण के लिए उपयोग किये जाते हैं:

() आधारभूत मानचित्रण,

() समन्वय मानचित्रण,

() त्रिभुजाकार मानचित्रण, और

() ध्रुवीय/जाल समन्वय मानचित्रण

() आधारभूत मानचित्रण यह सबसे सटीक और बुनियादी विधि है। इस पद्धति के लिए, मापों का संचालन करने के लिए एक आधार रेखा विकसित की जाती है या पहचानी जाती है। अपराध स्थल एक मौजूदा क्षेत्र हो सकता है, जैसे कि; एक सड़क के किनारे, एक दीवार, बाड़, आदि, या यह अन्वेषकों द्वारा विकसित किया जा सकता है, जैसे कि; एक तार या टेप रखकर।

()समन्वय मानचित्रण यह विधि बेसलाइन विधि की तुलना में अधिक सटीक विधि है क्योंकि यह एक के बजाय दो आधारभूत रेखाओं का उपयोग करती है। यह विधि दो माप तकनीक के कारण सिंगल लाइन बेसलाइन विधि की तुलना में अधिक सटीक है। यह विधि विशेष रूप से सीमित स्थानों और छोटे आंतरिक दृश्यों में उपयोगी है। जैसे कि; एक कमरा, केबिन, आदि।

()त्रिभुजाकार मानचित्रण यह सबसे सटीक तरीका है जो उन्नत तकनीक का उपयोग नहीं करता है। हालांकि यह अधिक श्रमसाध्य और समय लेने वाला है, यह मानचित्रण के पूर्वोक्त तरीकों की तुलना में पर्याप्त रूप से अधिक सटीक है।

()ध्रुवीय/जाल समन्वय मानचित्रण इस विधि द्वारा मापन करने के लिए कोण और ध्रुवीय दिशाओं को मापने के लिए एक पारगमन या कम्पास आवश्यक है। इस पद्धति का उपयोग बहुत कम स्थलों (जैसे कि, वन या बड़े क्षेत्र में विमान दुर्घटना) के साथ बड़े बाह्य दृश्यों में किया जाता है।

उन्नत मानचित्रण तकनीक कुछ विभागों में आधुनिक तकनीक का बेहतर उपयोग करने की क्षमता हो सकती है, जैसे कि; वैश्विक पोजिशनिंग सिस्टम (GPS) और टोटल स्टेशन, जो मैपिंग सिस्टम हैं जो ध्रुवीय निर्देशांक में माप ले सकते हैं और फिर माप को ग्रिड निर्देशांक में बदल सकते हैं।

3. रेखाचित्रण अपराध स्थल के प्रलेखन के लिए दो प्रकार के स्केच बनाए जाते हैं: –

  •  कच्चा रेखाचित्रण
  •  अंतिम रेखाचित्रण

रेखाचित्रण अपराध-स्थल प्रलेखन के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि:

• यह भौतिक तथ्यों का सटीक चित्रण करता है।

• अपराध स्थल का रेखाचित्रण घटनास्थल पर घटनाओं के अनुक्रम से संबंधित हैं।

• यह अपराध स्थल और घटनास्थल पर साक्ष्य के साथ वस्तुओं का सटीक स्थान और संबंध स्थापित करता है।

• यह अनुपस्थित व्यक्तियों के मन में अपराध-स्थल की छवि बनाने का कार्य करता है।

• अपराध-स्थल का रेखाचित्रण अग्रिम कार्यवाहियों के लिये एक स्थायी अभिलेख होता है।

• सामान्यतः यह न्यायालय में स्वीकार्य है।

• यह साक्षात्कार और पूछताछ में सहायता करता है।

• यह जाँचकर्ताओं को लिखित जाँच रिपोर्ट तैयार करने में मदद करता है।

• यह मामले को न्यायालय में पेश करने में सहायता करता है। भलीभांति रुप से तैयार किए गए रेखाचित्र न्यायपालिका, गवाहों और अन्य लोगों को अपराध स्थल की कल्पना करने में मदद करते हैं।

जांचकर्ता आसानी से रेखाचित्रों की मदद से एक अपराध-स्थल को पुनः याद कर सकते हैं, और पूरे अपराध-स्थल को एक दृष्टिकोण में समेट सकते हैं, और तस्वीरों के साथ, यह समग्र जांच का एक अधिक स्पष्ट विचार प्रदान कर सकता है, साथ ही साथ एक घर के माध्यम से साक्ष्यों के व्यक्तिगत टुकड़ों को इंगित करने में सहायता कर सकता है। उदाहरण के लिए – एक अपराध-स्थल का एक विहंगम दृश्य रेखांकन एक ही बार मे पूरे दृश्य को रेखांकित कर लेने में सक्षम बनाता है।

4. फोटोग्राफी अपराध स्थल पर किसी भी चीज को छूने से पहले उसकी फोटो खींचनी चाहिए। पीड़ित और अपराध स्थल पर मिली हर चीज की फोटोग्राफी करनी चाहिए। सूक्ष्म साक्ष्य से लेकर वृहद साक्ष्यों तक, प्रत्येक की फोटोग्राफी करनी चाहिए। उदाहरणार्थ- एक बाल से लेकर बड़े से सोफे तक की छवि लेनी चाहिए।

प्रभावी रूप से एक अपराध-स्थल की समीक्षा करने के लिए, और पूरे अपराध-स्थल को देखने के लिए और तस्वीरों के साथ देखने के लिए, प्रतिनिधि सामान्य परीक्षण पर अधिक स्पष्ट विचार दे सकता है, जैसे कि अपराध-स्थल से साक्ष्य को इंगित करने के लिए।

5. वीडियोग्राफी अपराध-स्थल की संपूर्ण् वीडियोग्राफी भी जरूरी है, ताकि यदि रेखांकन या फोटोग्राफी के दौरान कोई वस्तु या जगह छूट गई हो तो उसे पूरे अपराध-स्थल की वीडियोग्राफी में देखा जा सकता है।

जब एक वीडियोग्राफर घटनास्थल पर आता है, तो उसके द्वारा क्षेत्र का एक समग्र दृश्य विस्तृत कोण का उपयोग करते हुए दर्ज किया जाना चाहिए, इस दौरान  कानून प्रवर्तन टीम के एक प्रतिनिधि को मामले के तथ्यों के साथ दिनांक, समय, स्थान, केस नंबर और अन्य प्रासंगिक जानकारियों को प्रदान करते हुए भी रिकार्ड करना चाहिए।

सूक्ष्म साक्ष्यों को मानक या मापक के आकार की वस्तुओं के साथ निकटता से विडियोग्राफी करनी चाहिए।

साक्ष्य क्या हैं? (What is Evidence)

साक्ष्य वह जानकारी है जिसका उपयोग कानूनी कार्यवाही में अपराध को साबित करने या किसी को निर्दोष साबित करने के लिए किया जाता है। साक्ष्य कुछ भी हो सकता है। उदाहरण के लिए; दस्तावेज, वस्तु, या गवाह, आदि।

“भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872” के तहत साक्ष्य की परिभाषा ”कुछ भी जिसके द्वारा तथ्य की विवादित बात स्वीकृत या अस्वीकृत हो जाती है, जो कुछ भी न्यायालय में स्पष्ट रूप से प्रकट है। ”

साक्ष्य की श्रेणियाँ (Categories of Evidence)

साक्ष्य अपनी विशेषताओं और विश्वसनीयता के आधार पर कई श्रेणियों में विभाजित है।

विधि साक्ष्यों को दो बुनियादी श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है:

  • भौतिक साक्ष्यऔर जैविक साक्ष्य

कानूनी शब्दों में साक्ष्य को दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है:

  • प्रत्यक्ष और पारिस्थितिजन्य साक्ष्य

अन्य साक्ष्य:

  • सहयोगी साक्ष्य और पुर्ननिर्मित साक्ष्य

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